परिचय (आयुर्वेद) |
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आयुर्वेद के सही समय अवधि का निर्धारण करना बहुत कठिन
है। तथापि, मौखिक परंपरा के रूप में आयुर्वेद की उत्पत्ति
लगभग 6000 ई.पू. मानी जाती है । आयुर्वेद का इतिहास भारतीय
उप-महाद्वीप के इतिहास एवं संस्कृति के साथ घनिष्ठ रूप से
गूँथा हुआ है । आयुर्वेद ने उस
वैदिक परिकल्पना को अपनाया कि सूक्षम जगत (व्यक्ति) एवं
ब्रह्माण्ड (सृष्टि) में सामान्य आधारभूत सिद्धांत हैं।
मनुष्य एवं सृष्टि समान आधारभूत तत्वों से निर्मित हैं
। शुद्धीकरण एवं कायाकल्प की विभिन्न विधियों के साथ-साथ आयुर्वेद निरोधक एवं उपचारात्मक चिकित्साओं पर जोर देता है । आयुर्वेद न केवल औषधि की एक व्यवस्था है, यह मात्र उपचार व्यवस्था से अधिक कुछ है;यह हमारे सभी पहलुओं में तन्दुरूस्ती एवं खुशी में वृद्धि के लिये अभिकल्पित एक स्वास्थ्य संवर्धन कार्यक्रम एवं जीने की उपयुक्त कला है जो दीर्घायु प्राप्त करने में मदद मदद करता है । अनुलूलतम स्वास्थ्य की प्राप्ति एवं हमारी क्षमताओं का अधिकतम उपयोग के लिये यह हमें जीने का तरीका बतलाता है । किसी के अपने सही कार्य के द्वारा एक स्वास्थ्यकर जीवनशैली का निर्वाह "स्वास्थ्यवृत्त" कहलाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ "किसी के अपनी प्रकृत्ति के अनुरूप जीवनशैली" है । एक जीवनशैली (पथ्यापथ्य नियम) जो कि व्यक्ति के शारीरिक गठन के साथ संतुलित है वह उन्हें प्रतिदिन ताजगी एवं जीवनशक्ति का आनन्द उठाने की अनुमति देगा । यह आहार का उचित चुनाव करने, रहन-सहन की आदतों एवं शरीर,मन एवं चेतना में संतुलन पुन:स्थापित करने की कवायद करने में प्रत्येक व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है, इस प्रकार बीमारी को शरीर में पाँव फैलाने देने से रोकता है । आयुर्वेद शब्द दो संस्कृत शब्दों - आयुर अर्थात जीवन एवं वेद अर्थात विज्ञान से मिलकर बना है । इस प्रकार आयुर्वेद का अर्थ "जीवन का विज्ञान है"। आयुर्वेद भारत में स्वास्थ्य चिकित्सा की एक प्रमुख प्रणाली रही है, यद्यपि भारत में, विशेषकर शहरी क्षेत्र में पारंपरिक (पश्चिमी) औषधि अधिक व्यापक हो रही है। भारत की लगभग 70% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है; अपने प्राथमिक स्वास्थ्य चिकित्सा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये लगभग दो-तिहाई ग्रामीण लोग अब भी आयुर्वेद एवं औषधियुक्त पौधों का प्रयोग करते है ।
आयुर्वेद के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य पाँच आधारभूत तत्वों - आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी द्वारा प्रकट ब्रह्माण्डीय चेतना की एक अनोखी रचना है । आयुर्वेद के अनुसार सात आधारभूत संघटनों में एक या अधिक दोष प्रबल हैं । वे हैं: वात, पित्त या कफ प्रबल, वात-पित्त, पित्त-कफ या कफ-वात प्रबल एवं एक विरल घटना समान संतुलन में वात-पित्त-कफ का होना । अपनी प्रकृति के अनुसार प्रत्येक व्यक्तिगत संघटन का वात, पित्त एवं कफ (त्रिदोष) का अपना अनोखा संतुलन है । त्रिदोष का यह संतुलन प्राकृतिक का अपना अनुक्रम है । जब त्रिदोष का यह संतुलन गड़बड़ा जाता है, तो यह असंतुलन उत्पन करता है, जो अक्रम है । स्वास्थ्य अनुक्रम है; रोग अक्रम है । शरीर के अंदर अनुक्रम एवं अक्रम के बीच निरंतर अंत:क्रिया होती है, इस प्रकार एक बार ज कोई अक्रम की प्रकृति एवं संरचना को समझ जाता है तो वह पुन: अनुक्रम स्थापित कर सकता है । आयुर्वेद मानता है कि अक्रम के बीच अनुक्रम का अस्तित्व है ।
तीन दोषों (त्रिदोष) वात, पित्त एवं कफ के बारे में कुछ
महत्वपूर्ण मान्यताएँ: आयुर्वेद के द्वारा परिभाषित अनुक्रम स्वास्थ्य की अवस्था है । इसका अस्तित्व तब होता है जब पाचन अग्नि (जठराग्नि) एक संतुलित स्थिति में होता है; शारीरिक शरीरद्रव (वात,पित्त एवं कफ) संतुलन में होता है, तीन वर्ज्य पदार्थ (मूत्र, गुदा द्वारा उत्सर्जित शारीरिक अवशिष्ट एवं पसीना)उत्पन्न होते हैं एवं सामान्य रूप से उत्सर्जित होते हैं, सात शारीरिक ऊतक (रस, रक्त, मांस, मद, अस्थि, मज्जा एवं शुक्रलारतव) सामान्य रूप से कार्य करते हैं, एवं मन, इंद्रियाँ तथा चेतना एक-साथ मिलकर कार्य करते हैं । जन इन व्यवस्थाओं का संतुलन गड़बड़ हो जाता है तो अक्रम (रोग) प्रक्रिया शुरू होती है । आंतरिक वातवरण वात, पित्त एवं कफ से निर्धारित होता है जो निरंतर बाह्य वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं । गलत आहार, आदतें, जीवनशैली, असंगत भोजन का सम्मिश्रण (उदाहरण के लिये तरबूज एवं अनाज, या पकाये हुये शहद का सेवन आदि), मौसमी परिवर्तन, दमित भावनायें एवं तनाव के कारक वात, पित्त एवं कफ के संतुलन में परिवर्तन लाने के लिये एक-साथ या अलग-अलग कार्य करते हैं । कारणों की प्रकृति के अनुसार, वात, पित्त या कफ बिगाड़ या गड़बड़ी करते हैं जो जठराग्नि (जठरीय आग) को प्रभावित करता है एवं अम्म (जीवविष) उत्पन्न करता है ।
यह अम्म रक्त की प्रवाह में शामिल होता है एवं नलियों को अवरूद्ध करते हुए संपूर्ण शरीर में परिसंचरित होता है । रक्त में जीवविष के प्रतिधरण के फलस्वरूप विषरक्तता होती है । यह संचित विषक्तता एक बार अच्छी तरह स्थापित होने पर धीरे-धीरे प्राण (आवश्यक जीवन ऊर्जा), ओजस (प्रतिरोधी क्षमता), एवं तेजस (कॊशिकीय चयापचयी ऊर्जा) को प्रभावित करेगा जिससे रॊग होगाI शरीर से जीवविष को निकालना प्रकृति का प्रयास हो सकता है । प्रत्येक तथाकथित रोग अम्म विषाक्तता का संकट है । बिगड़े हुये दोषों के कारण अम्म सभी रोगों का मूलभूत आंतरिक कारण है । स्वास्थ्य एवं रोगों से संबंध रखने वाली प्रमुख मान्यताएँ, लोगों के बीच संबंधों के बारे में धारणाएँ, उनके स्वास्थ्य, एवं ब्रह्माण्ड यह निर्धारित करते हैं कि किस तरह आयुर्वेदिक चिकित्सक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली समस्याओं के संबंध में सोचते हैंI आयुर्वेद मानता है कि: • ब्रह्माण्ड में सभी वस्तुएँ (सजीव एवं निर्जीव दोनों)
एक-साथ जुड़े हुये हैं। आयुर्वेद की शरीर के संघटन के संबंध में कुछ मूलभूत
मान्यताएँ हैं । "शारीरिक गठन" एक व्यक्ति के सामान्य
स्वास्थ्य, उसके संतुलन से बाहर होने की संभावना, एवं उसकी
रोग प्रतिरोध एवं रोगमुक्त होने की क्षमता तथा अन्य
स्वास्थ्य समस्याओं को बतलाती है । शारीरिक गठन को
प्रकृतिकहा जाता है । माना जाता है कि प्रकृति शारीरिक एवं
मनोवैज्ञानिक विशेषताओं एवं शरीर के कार्य करने के तरीकों का
एक अनोखा सम्मिश्रण है । यह पाचन एवं अपशिष्ट पदार्थों के
साथ शरीर के व्यवहार करने के तरीकों द्वारा प्रभावित होता
है । प्रकृति एक व्यक्ति के
जीवनकाल में अपरिवर्तित रहना माना जाता है
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