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आयुर्वेद पूर्णतावादी उपचार विज्ञान के विषय में है
एवं यह सभी व्यक्तियों के
लिये
पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने की संपूर्ण योजना को शामिल करता हैI
इस तथ्य
के
बावजूद
कि इसकी उत्पत्ति हजारों वर्षों पूर्व हुई,
आयुर्वेद वर्तमान वैज्ञानिक जगत
में
समान रूप से प्रासंगिक हैI
आयुर्वेदिक मालिश सभी शारीरिक कष्ट को दूर करता है,
विभिन्न भयानक अपंगताओं को
नियंत्रित करता है, मध्य
वय संलक्षण से बचाव करता है,
उम्र
वृद्धि की प्रक्रिया को
धीमा
करता है एवं बेकार पड़े हुये ऊतकों
की मरम्मत कर शरीर तथा मन को असीमित
उपचारात्मक शक्तियाँ प्रदान करता हैI
यह
शरीर को पुनर्जीवित करता है,
स्मरण शक्ति
बढ़ाता
है,
पौरूष
एवं जीवन शक्ति
में सुधार लाता है एवं शारीरिक
एवं मानसिक रूप से
चुस्त
बनाता हैI
आयुर्वेदिक मालिश तकनीक विश्राम प्रदान करता है,
परिसंचरण तथा जीवविषों का
निष्कासन करता हैI
यदि
दैनिक अभ्यास के रूप में अपनाया जाये,
तो
आयुर्वेदिक मालिश
तकनीक
शरीर का कायाकल्प
करने में भी
मदद करता हैI
प्राचीन कालों में आयुर्वेदिक
चिकित्सालाएँ आम
तौर पर मालिश
नहीं प्रदान करती थीं,
क्योंकि सभी इसे देते एवं
प्राप्त करते थेI
केवल
जब मरीजों को एक विशेष उपचार की जरूरत होती थी तो उन्हें
विशेषज्ञों के पास भेजा
जाता था
जो उचित आयुर्वेदिक तकनीकों का प्रयोग करते थेI
मलिश की तकनीकें पति एवं पत्नी के बीच प्रेम संबंध
कायम रखने में
भी मदद कर
सकती
हैंI
इस
प्रकार के आरामदेह विश्राम के बाद प्रेम को बाँटना एवं देना अधिक
आसान
हैI विवाह के
पूर्व मालिश करना हिन्दू
परंपरा के कुछ समारोहों में से एक है जो आज
भी
अनिवार्य है ताकि दुल्हा एवं दुल्हन विवाह के दिन विशेष रूप से
सुन्दर दिख सकेंI
चिकित्सात्मक उपचार
एलोपैथिक औषधि में संधिसोथ, स्पॉन्डिलाइटिस,
कटिशूल,
स्लिप्ड डिस्क,
कंधा
का
अकड़ना,
तनाव
एवं मोच,
तंत्रों का दर्द (साइटिका) आदिI
आयुर्वेद में इस प्रकार की
समस्याओं के उपचार के लिये अनेक फल-सिद्ध प्रक्रियाएँ अर्थात
पिझिचिल,
नजावराकिझी,
अभयांगम, शिरोधारा,
शिरोवस्ती,
इलाकिझी,
उबटन
आदि उपलब्ध हैंI
पिझिचिल
एक आरामदेह,
शमक
एवं पुन: यौवन प्रदान करने वाला उपचार है जिसमें
औषधियुक्त नर्म तेल
संपूर्ण शरीर (सिर एवं गर्दन को छोड़कर) पर
एक निश्चित समय के
लिये
निरंतर धार के रूप में उड़ेला जाता हैI
इसका
प्रयोग संधिसोथ,
उम्र
वृद्धि,
सामान्य कमजोरी,
पक्षाघात का प्रभावपूर्ण ढ़ंग
से उपचार करने के लिये किया जाता हैI
’पिझिचिल’
एवं
’सर्वांगधारा’
तकनीकी
रूप से समान हैंI
’पिझिचिल’
का
अक्षरश:
अर्थ
’निचोड़ना’
हैI
यहाँ,
नर्म
तेल को मरीज के शरीर के ऊपर तेल के पात्र में
समय-समय पर डुबाये
हुये कपड़े के द्वारा निचोड़ा जाता हैI
पिझिचिल के
प्रयोग की
सलाह वात
शरीरी द्रव-पक्षाघात (आंशिक पक्षाघात) के निरस्तीकरण,
लकवा
एवं
मांशपेशियों में तनाव के द्वारा उत्पन्न बीमारियों -
तथा
मांशपेशियों को प्रभावित
करने
वाली अन्य अपकर्षक बीमरियों के लिये दी जाती हैI
नजवराकीझी
सभी प्रकार के वात रोगों,
जोड़ों
में दर्द,
मांशपेशियों के
अपक्षय, त्वचा
विकार,
चोट
एवं अभिघात के स्वास्थ्य्लाभ की अवधि,
गठिया,
आम
कमजोरी,
लकवा
आदि के लिये चिकित्सा हैI
औषधियुक्त तेल के प्रयोग के बाद,
औषधियुक्त
दूध-दलिया के पुलिंदे के प्रयोग के द्वारा आपके संपूर्ण शरीर का
पूर्ण शरीर मालिश
कर
पसीना निकाला जाता हैI
यह एक
प्रतिरक्षी क्षमता बढ़ाने वाला पुनर्यौवन चिकित्सा
हैI
विभिन्न बीमारियों के लिये उपचार होने के अतिरिक्त,
नजवराकीझी आपकी त्वचा में
नये
प्राण भरता है एवं इसमे चमक लाता हैI
शिरोधारा
एक अनोखा उपचार है जहाँ एक निश्चित अवधि के लिये सिर को विशिष्ट
औषधियुक्त तेलों के नियमित धार
में स्नान कराया जाता हैI
यह
मानसिक आराम के लिये एक
प्रभावकारी चिकित्सा है एव यह अनिद्रा,
तनाव,
विषाद, घटती
हुई मानसिक चुस्ती आदि
को ठीक
करता हैI
जब
औषधियुक्त छाछ तेल का स्थान लेता है,
इस
चिकित्सा को तक्रधारा
कहा जाता
हैI
शिरोवस्ती
निष्कासन (शोधन) उपचार की
अपेक्षा उपशामक
(शमन) उपचार अधिक माना
जाता
हैI
सामान्य रूप से इस उपचार के पूर्व तेल डालने (स्नेहन) एवं पसीना
निकालने
(स्वेदन)
की क्रिया होती हैI
छ: से
आठ फीट लंबा चमड़े का आस्तीन मरीज के सिर पर रखा
जाता
है एवं इसे सही स्थान पर रखने के लिये माथे के चारों तरफ एक पट्टी बाँधी
जाती
हैI
आस्तीन
के भीतरी भाग पर अस्तर चढ़ाने के
लिये तथा यह सुनिश्चित करने के लिये कि
रिसाव
न हो,
सना
हुआ आटा का प्रयोग किया जाता हैI
तब तेल
आस्तीन में उड़ेला जाता है
एवं
सिर पर कुछ पल रहने दिया जाता हैI
वहाँ
तेल को कितने देर तक रखा जाये इसका
निर्धारण बीमारी की कठोरता से होता हैI
सामान्य रूप से वात विकार से उत्पन्न
बीमारियों के लिये यह पचास मिनट तक होता हैI
इस
प्रकार का वस्ती संवेदक कार्यों में
सुधार
लाता हैI
यह
अर्द्ध नासीय शिरानाल क्षेत्र में कफ जनित स्रावों को बढ़ावा देता
है जो
मस्तिष्क में वाहिकीय संकुलन को कम करता हैI
यह
उपचार आंशिक पक्षाघात,
मोतियाबिंद,
बहरापन,
कान
दर्द,
अनिद्रा एवं कपालीय शिरा
को कष्ट देने वाले अन्य
बीमारियों के लिये निर्धारित हैI
शिरोवस्ती वाहिकीय सिरदर्दों, खंडित
मनस्कता,
सनकी-बाध्यकर विकारों, स्मरण शक्ति
में क्षीणता,
अनाभिविन्यास,
ग्लूकोमा
एवं शिरानाल
सिरदर्दों में अत्यधिक उपयोगी होता हैI
अभयांगम
पुनर्यौवन के लिये सामान्य चिकित्सा हैI
जड़ी-बूटीयुक्त तेल के साथ इस
संपूर्ण शरीर मालिश का प्रयोग शरीर के
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आवश्यक
बिन्दुओं(मर्मों) के विशेष
संबंध
में मालिश
के लिये किया जाता हैI
यह
बेहतर संचार,
मांशपेशीय स्वास्थ्य,
मानसिक
शांति
एवं बेहतर स्वास्थ्य अनुरक्षण में मदद करता हैI
यह
आपकी त्वचा को मजबूत बनाता
है एवं
आदर्श स्वास्थ्य तथा दीर्घायुपन को प्राप्त करने के लिये सभी ऊतकों
को
पुनर्यौवन प्रदान
करता है तथा मजबूती देता हैI
यह ओजस
(प्राथमिक जीवनशक्ति) को
बढ़ाता
है एवं इस प्रकार आपके शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता हैI
आपकी
आँख के
लिये
लाभकारी होने के अतिरिक्त,
अभयांगम आपको गहरी निद्रा प्रदान करता हैI
यह भी
वात
रोग का एक उपचार हैI
इलाकिझी
त्वचा में नये प्राण भरने की चिकित्सा हैI
जड़ी-बूटी संबंधी संबंधी
पुलटिस
विभिन्न जड़ी-बूटियों एवं औषधियुक्त
चूर्ण से
बनती हैI
औषधियुक्त तेलों
में गर्म
होने के बाद आपके सम्पूर्ण शरीर
की मालिश इन पुलटिसों से की जाती हैI
यह
परिसंचरण को बढ़ावा देता है
एवं पसीने को बढ़ाता है जो बदले में वर्ज्य
पदार्थ को
बाहर
निकालने में त्वचा की मदद करता है,
उसके
द्वारा त्वचा के स्वास्थ्य में
सुधार
लाता
हैI
इसका
प्रयोग जोड़ों के दर्द,
मांशपेशी के ऐठनों,
तनाव
एवं गठिया को रोकने
के
लिये भी होता हैI
उपर्युक्त सभी उपचारों को एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति
के साथ भी किया जा सकता है
ताकि
उसकी प्रतिरक्षा,
जीवनशक्ति एवं जीवन की दीर्घायु को बढ़ाया
जा सकेI
चिकित्सक
की
दिशा के अनुसार उपर्युक्त उपचारों को विभिन्न सम्मिश्रणों में किया
जा सकता हैI
निश्चित अवधियों तक सहने एवं
निश्चित अंतरालों पर
दुहराने के बाद के बाद इनमें से
प्रत्येक सम्मिश्रण एक उपचारात्मक एवं पुनर्यौवन प्रदान करने वाला
प्रभाव प्रदान
करता
हैI
उबटन एक सौन्दर्य मालिश हैI
इसका
प्रयोग वृद्ध लोगों की मदद करने के लिये होता
है एवं
युवा माताओं के साथ-साथ शिशुओं के लिये विशेष तकनीकों का विकास
किया गया
हैI
भारतीय
पारंपरिक मालिश तकनीक आयुर्वेदिक दोषों एवं मर्मों
(प्रतिवर्ती उपचार के
समान दवाब बिन्दुओं) पर आधारित हैI
विशेष
चिकित्सात्मक
उपचारों जैसे कि पंचकर्म शुद्धिकरण में विशिष्ट आयुर्वेदिक मालिश
चिकित्सा का
प्रयोग
किया जाता हैI
श्री बिन्दु सेवा संस्थान (भारत) एवं स्वामी बालेन्दु ई.वी. (जर्मनी) पंजीकृत
निर्लाभ धर्मार्थ संगठन हैं जिनका उद्देश्य भारत में गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान
करना हैI
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