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उन्होंने राम
चरित मानस के सिद्धान्तों एवं सार का प्राचार करने
के
लिये वाराणसी
में अखिल भारतीय
राम चरित मानस सम्मेलन
की स्थापना कीI
उनके मत के
अनुसार,
राम चरित मानस में
प्रतिपादित सिद्धान्त किसी विशेष जाति या समुदाय के
प्रति निर्देषित नहीं हैं बल्कि वे विश्व के सभी लोगों
की भलाई
तथा उत्थान के लिये
है
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वृन्दावन में उन्होंने प्रेम धाम आश्रम की स्थापना कीI
उनके अनुसार,
श्रद्धा एवं प्रेम सभी धर्मों से अधिक महान हैं और
प्रेम ही ईश्वर हैI
उन्होंने
अनेक पुस्तकों जैसे कि "मोहन मोहिनी",
"मानस
माधुरी",
"राम
राज्य",
"कीर्तन
मंजरी",
"पाषाणी
अहिल्या",
"मानस
का मल्लाह", "धर्मावतार",
"मुरली
मनोहर",
"भयंकर भूत",
"राम
गीता",
"रास
पंचाध्ययी",
"सुमन
संची",
"
बोध वाणी",
"नवयुग
विनोद" की
रचना
की
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सम्पूर्ण भारत में उनके लाखों शिष्य हुये
जो उन्हें देखकर,
पढ़कर एवं
सुनकर प्रसन्नता अनुभव करते थेI
जब वे वाराणसी की पावन नगरी में अपना आध्यात्मिक
व्याख्यान देते थे तो लोग इतने मुग्ध हो जाते थे कि वे
उन्हें सुनने के लिये अपना
दैनिक काम-काज भी छोड़ देते थेI
राजा राम राम के उनके उच्चारण को सुनकर लोग
मन्त्रमुग्ध हो जाते थेI
एक बार चित्रकूट में लगभग
20
लाख लोग उनके व्याख्यान को
सुनने के लिये एक साथ एकत्रित हुये
I
उन्होंने देश्भक्ति नाटकों,
कविताओं आदि कि रचना कर भारत के
स्वतन्त्रता आन्दोलन में अपना योगदान दियाI
उन्होंने अपनी पुस्तक में ब्रिटिश सरकार
को एक "रावण" की
सरकार कहाI सरकार
ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया,
उन्हें न्यायालय में
प्रस्तुत किया एवं उन पर सरकार की अवमानना का आरोप
लगाया गयाI
उन्होंने अपनी पुस्तक
में समानताओं का वर्णन किया,
इसलिये उन्होंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया एवं उन पर
गंभीर आरोप लगाया गयाI
तब उन्होंने न्यायालय में कहा ’मैंने
वहाँ जो लिखा उसे यदि
आप स्वीकार करते हैं कि वास्तव
में यह एक रावण के जैसी सरकार है तो आपसे
कोई भी
दण्ड पाने के लिये तैयार हू”
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इसके कारण उन्होंने उन्हें मुक्त कर दिया
लेकिन उनके
पुस्तक पर तब भी
प्रतिबन्ध लगा रहा
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राष्त्रपिता महात्मा गाँधी उन्हें बहुत चाहते थेI
गाँधीजी ने उन्हें
दो अवसरों पर व्याख्यान देनॆ के लिये आमन्त्रित किया
ताकि वे उन्हें स्वयं सुन सके
और उन्होंने उन्हें एक पुस्तक लिखने के लिये
प्रोत्साहित कियाI
गोस्वामी श्री
बिन्दु जी महाराज ने तब राष्ट्रिय रामायण एवं राम
राज्य की रचना की
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लेकिन राजनीति में उनकी कोई अभिरूचि नहीं थीI
भारत के प्रथम
प्रधान्मन्त्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें चुनाव
लड़्ने के लिये आमन्त्रित किया
क्योंकि वे बहुत प्रसिद्ध थे और लोग उन्हें पसन्द करते
थे,
लेकिन उन्होंने प्रस्ताव
स्वीकार नहीं किया और कहा: ’मैं
एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूँI
मैं आध्यात्मिक हूँ
और केवल आध्यात्मिक ही रहना चाहता हूँ’
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वे वृन्दावन में ही अपना शरीर त्याग करना चाहते थे और
जब वे बीमार थे
एवं अस्पताल में थे तब उन्होंने अपनी इस आखिरी इच्छा
को स्वामी बालकराम जी को
दिल्ली में बतायाI
इसलिये वे उन्हें वृन्दावन ले आये और
1
दिसम्बर,
1964
को
उन्होंने वृन्दावन के प्रेम आश्रम में अपना शरीर त्याग
दिया
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आज के दिनों में जो कोई भी रामायण,
भागवत एवं गीता पर व्याख्यान देता
है या हिन्दी भजन तथा कीर्तन गाता है,
वे सभी उनका कविता पाठ करते हैं
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