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Blankस्वामीजी द्वारा चिकित्सा सूचना

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एक परिचय

 Swami jiखुशहाली की अवस्था एक दुर्लभ रत्न है जिसकी इच्छा प्रत्येक मनुष्य करता है I यह एक गुण भी है जिसे इस दुनिया में न तो प्राप्त किया जा सकता है और न हीं कायम रखा जा सकता हैI हम खुशी एवं खुशहाली की खोज में मीलों भ्रमण कर सकते हैं और बहुत रूपया खर्च कर सकते हैं  लेकिन हमें वह नहीं मिल सकता है जिसे हम चाहते हैंतथापि इस गुण के स्रोत वास्तव में कहीं बाहर नहीं हैं बल्कि हमारे अपने अंदर ही हैंI यही वह गुण है जिसे हम धारण करते हैं लेकिन जिससे प्राय: हम अंजान रहते हैंI हमारी खुशहाली की अवस्था ही हमारा वास्तविक घर हैI और यद्यपि हम अमीर हैं और हमारा शरीर स्वस्थ है, हम वास्तव में तभी अच्छा मह्सूस करते हैं जब हम खुश रहते हैं और हमारे मन में शान्ति रहती है I

यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि एक अनुकूल एवं शान्तिपूर्ण आंतरिक मनोवृत्ति हमारी प्रतिरक्षी व्यवस्था को सुधारता है एवं हमें विषाणुओं के विरूद्ध अधिक प्रतिरोधी बनाता है एवं विभिन्न गंभीर बीमरियाँ जैसे कैंसर या हृदय की बीमरियाँ आदि होने के खतरे को कम करता हैI

ध्यान एवं प्राणायाम तकनीक (श्वाँस क्रिया) हमें आंतरिक शांति प्राप्त करने एवं इसे सुरक्षित रखने में मदद करता है I तथापि हमारे आध्यात्मिक अभ्यास के आरम्भ में कभी-कभी जब  हम बैठते हैं एवं ध्यान करते हैं तो हमें शांति नहीं मिलती है चूँकि हमारा मन अनगिनत दैनिक घटनाओं से बहुत अधिक प्रभावित होता है I तब ध्यान एक ऐसे कमरे में प्रवेश करने जैसा महसूस होता है जो उन चीजों से भरी हुई हैं जिनकी हमें आवश्यकता नहीं है लेकिन जिसे हमने एकत्रित किया है I और शान्ति एवं खुशी प्रकट करने के लिये कोई स्वतन्त्र स्थान मालूम नहीं पड़ता है I इसलिये ध्यान एक कठिन काम हो जाता है क्योंकि हम अनवरत अपने आपको अपने मन के स्थान को साफ करता हुआ पाते हैं जिसे हमारा मन प्रकट करता हैऔर एक नए एवं बेहतर मनोभावों के लिए स्थान बनाने की कोशिश करता है I

कभी-कभी हमारे मन के कमरे को साफ करने की इस प्रक्रिया के दौरान हमारा भौतिक शरीर भी पीड़ित होता है चूँकि हम सिर दर्द या शरीर के दूसरे हिस्से में दर्द महसूस कर सकते हैं जहाँ संचित तनाव एवं मानसिक अवरोध धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है कभी-कभी दर्द इतना तेज हो सकता है कि हमें अपने शारीरिक कष्ट से उबरने के लिए चिकित्सा की आवश्यकता महसूस होती हैI लेकिन हमारा शरीर केवल एक भौतिक तत्व नहीं है जिसका अस्तित्व स्वयं के द्वारा होता है I इस बिन्दु पर हम इस तत्व का पता नहीं लगा सकते हैं कि दर्द चिकित्सा का कौन सा रूप अधिक  उपयुक्त है, चूँकि इसका उत्तर एक स्थिति से दूसरी स्थिति में अलग-अलग हो सकता है I तथापि हम यह जोर देकर कह सकते हैं कि केवल औषधि के द्वारा इलाज प्राय: एक बीमारी को पूर्ण रुप से दूर नहीं करता हैइसका कारण यह है कि हमारा शरीर केवल एक ऐसा तत्व नहीं है जिसका अस्तित्व स्वयं के द्वारा है बल्कि यह गले के हार की मोतियों के समान है और यह हमारे मन एवं आत्मा से जुड़ा हुआ है I जब धागा टूट जाता है और एक मोती गिर जाता है तो सम्पूर्ण गले का हार टूट जाता है I इस प्रकार बीमारी सभी तीन स्तरों पर होती है I

हमें इन अवस्थाओं को सुरक्षित बनाए रखने की जरूरत है ताकि हमारा शरीर, मन एवं आत्मा एक साथ काम कर सकें, चूँकि समन्वित, संतुलित एवं अच्छे ढ़ंग से कार्य करने के लिए उन्हें एक-दूसरे की आवश्यकता एवं मदद की जरूरत है I

जब स्वामीजी के द्वारा हमारी आध्यात्मिक चिकित्सा होती है तो हमारे शरीर की ऊर्जाएँ इसप्रकार से समन्वित हो जाती हैं कि वे शरीर में सुचारू रूप से प्रवाहित हो सकती हैं I स्वामीजी रोगी के शरीर में अनुकूल एवं चिकित्सा ऊर्जा के लिए मार्ग बनाते हैं या उसे संप्रेषित करते हैं और व्यक्ति को पुन: ऊर्जावान करते हैं ताकि वह अधिक शक्तिशाली महसूस कर सके या उसका कष्ट दूर हो सके और वह बीमारी या समस्या का सामना कर सके I इसलिए स्वामीजी व्यक्ति की सहायता करते हैं ताकि वह अपनी सहायता कर सके I वे प्राचीन एवं बहुत विशेष मंत्रों का उच्चारण भी करते हैं जिसमें चिकित्सा की तीव्र क्षमता होती है I लेकिन एक तथाकथित मंत्र क्या है? व्याकरण के अनुसार मंत्र शब्द दो शब्दांशों मन एवं त्र से बनता है I मन हमारे मस्तिष्क, हमारी सोचने, प्रकट करने, स्मरण आदि की क्षमता को सूचित करता है I त्र कोई कवच जैसी चीज, कोई ढाल या प्रतिरक्षक है I इसलिए मंत्र एक शब्द या शब्दखंड  है जो हमारी रक्षा करता हैI यह कहा जाता है कि मंत्र बीजों के समान हैं जो अंकुरित होते हैं और जब उनका उच्चारण या पुनरावृत्ति होती है तो वे हमारे अंदर उसके गुण प्रकट करते हैं I

 हमारे उच्चारण के गुण एवं प्रभावशीलता हमारे मन एवं हृदय की शुद्धि तथा मंत्र की शक्ति में हमारी आस्था पर निर्भर करती है I इसके अतिरिक्त जिस मनोवृत्ति से हम उच्चारण करते हैं वह भी बहुत महत्वपूर्ण है I

हमारा आध्यात्मिक अभ्यास हमारे सम्पूर्ण शरीर को निर्मल करता है और एक चिकित्सक जिसने स्वयं को निर्मल किया है वह दूसरों को निर्मल होने या उनका उपचार करने में सहायता कर सकता है I आपको प्राप्त होने वाली सहायता  से यह आशा की जाती है कि आप स्वयं अपनी मदद करें I जब स्वामीजी अपनी गुफा में गए और आध्यात्मिकता का इतना गहन अभ्यास किया तो उन्होंने अपने आप का पूर्ण शुद्धिकरण किया और यह भी अनुभव किया कि उनका उद्देश्य लोगों की चिकित्सा करना हैI

निवारण के मंत्रों में हमारे चक्रों या केंद्रों के क्रियाकलापों को समन्वित करने की क्षमताएँ हैं जहाँ विशेष ऊर्जाएँ एक साथ एकत्रित होती हैं I जब हम अनवरत ऐसी चीजें सोचते हैं या करते हैं जिससे कि हमारे शरीर, मन एवं आत्मा को नुकसान  पहुँचे तो यह बीमारी हमारे चक्रों में चिन्हित या संयोजित होती हैं, जो चक्र के गुण को प्रभावित करती हैंI स्वामीजी सभी चक्रों को समन्वित करते हैं और कभी-कभी एक चक्र पर भी काम करते हैं जब यह उपयुक्त ढ़ँग से काम नहीं करती हैI

जब हमारे चक्र समन्वित होते हैं तब हमारे निवारक अभिकर्ता पुन: सक्रिय हो जाते हैं I प्राय: चिकित्सा तेज हो जाती है और बीमारी से उबरने की मात्रा में सुधार लाती है I तथापि आध्यात्मिक चिकित्सा पारंपरिक औषधि का परिपूरण कर सकती है I इसलिए जब स्वामीजी चिकित्सा करते हैं तो वे अच्छी ऊर्जा को समाहित करते हैं और बुरी ऊर्जा को त्यागने में मदद करते हैं I बुरी ऊर्जा के अनेक कारण हैं: यह अंशत: हमारे अपने सोचने एवं जीवन की शैली के द्वारा उत्पन्न होती है जो हमारे विरुद्ध काम करती है I लेकिन जिसे हम प्राय: समझ नहीं पाते हैं, क्योंकि हम अपनी शैली को अत्यधिक प्रबलतापूर्वक अंगीकार करते हैं I तथापि हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ प्रकट होने वाली बुरी ऊर्जाओं से भी हम प्रभावित होते हैं I उदाहरण के लिए जब लोग मनोविकारों जैसे कि ईर्ष्या एवं शत्रुता, प्रेम के अभाव या अत्यधिक शोर के बीच रहना या अन्य बुरे जीवन स्थितियों का सामना करते हैं तो बुरी ऊर्जा की उत्पत्ति के अनेक कारण होते हैं जो भौतिक, भावनात्मक, राजनीतिक या वे हमारे स्वयं की अज्ञानता एवं लापरवाही के कारण हो सकते है I

स्वामीजी "स्पर्श चिकित्सा" का प्रयोग करते हैंI उनकी उंगुलियाँ हल्के से शरीर पर घूमती हैं और उनकी उंगलियों के कम्पन से वे चिकित्सा ऊर्जा को रोगी के शरीर में भेजते हैं I

प्रत्येक चिकित्सक अनुपम हैं क्योंकि उन सभी के पास दिव्य ऊर्जा को भेजने की अपनी व्यक्तिगत विधियाँ हैं I स्वामीजी की विशेष पद्धति का मानव की प्रकृति से बहुत लेना-देना है: जैसा हम सब जानते हैं कि सभी मनुष्यों को व्यक्तिगत संबंध एवं स्नेहपूर्ण स्पर्श की आवश्यकता होती है क्योंकि यह हमें जीवित रखता है और यह हमारी प्रकृति है I इसके अतिरिक्त हमें एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण से यथार्थ को समझने की आवश्यकता है ताकि हम अपने आप को एवं जिस दुनिया में हम रहते हैं उसे समझ सकें I इसी प्रकार, हम ईश्वर के साथ भी एक व्यक्तिगत संबंध चाहते हैं चूँकि हम मनुष्यों के बीच व्याक्तिगत्य संबंध ढूँढते हैंअव्यक्तिक संबंध की अपेक्षा ईश्वर के साथ एक व्यक्तिगत संबंध बनाना हमारे लिए अधिक आसान है, चूँकि हम अपने साथी मनुष्यों के साथ ऐसा संबंध बनाना भी नहिं चाहते हैं I तत्पश्चात ऐसे सभी संबंध किसी भी प्रकार से लंबे समय तक टिकते नहीं हैं I इसलिये स्पर्श चिकित्सा चिकित्सा का बिल्कुल व्यक्तिगत रूप है अर्थात्‌ मनुष्य, जो सभी बिल्कुल निजी एवं व्यक्तिगत अस्तित्व हैं,  की प्रकृति से घनिष्ठतापूर्वक जुड़ा हुआ है I

जब स्वामीजी हल्के से रोगी का स्पर्श करते हैं तो व्यक्ति को अनुकूल ऊर्जा का व्यक्तिगत आभास होता है जब हम चेतनापूर्वक ऊर्जा के गुण का अनुभव करते हैं तो यह हमारे शरीर में अधिक प्रभावपूर्ण ढ़ंग से कर्य करता है एक उदार एवं मृदु स्पर्श हमारी आत्मा तक पहुँचने का एक मार्ग भी है कुछ लोगों ने कहा कि स्वामीजी का स्पर्श स्फुर्तिदायक  जल के समान है I चिकित्सा के बाद एक महिला ने कहा कि उन्होंने महसूस किया कि जैसे उन्होंने पवित्र गंगा नदी में स्नान किया हो I जिस ढ़ंग से एक व्यक्ति महसूस करता है वह व्यक्तिगत रूप से भिन्न हो सकता है, लेकिन मुख्य  विषय यह है कि चिकित्सा हमारे शरीर को हमारे मन एवं आत्मा के साथ समन्वित एवं एकीकृत करता है और एक पूर्ण दिव्य ऊर्जा से अंदर एवं बाहर चिकित्सा करने में हमारी मदद करता है I

स्वामीजी के चिकित्सा के कार्यों की प्रशंसा कर हम हमारे अपने अनुकूल आंतरिक गुणों की खोज और प्रशंसा करना एवं उनसे अपना काम करवाना भी सीख सकते हैं

निवारण के मंत्रों में हमारे चक्रों या केंद्रों के क्रियाकलापों को समन्वित करने की क्षमताएँ हैं जहाँ विशेष ऊर्जाएँ एक साथ एकत्रित होती हैं I जब हम अनवरत ऐसी चीजें सोचते हैं या करते हैं जिससे कि हमारे शरीर, मन एवं आत्मा को नुकसान  पहुँचे तो यह बीमारी हमारे चक्रों में चिन्हित या संयोजित होती हैं, जो चक्र के गुण को प्रभावित करती हैंI स्वामीजी सभी चक्रों को समन्वित करते हैं और कभी-कभी एक चक्र पर भी काम करते हैं जब यह उपयुक्त ढ़ँग से काम नहीं करती हैI

जब हमारे चक्र समन्वित होते हैं तब हमारे निवारक अभिकर्ता पुन: सक्रिय हो जाते हैं I प्राय: चिकित्सा तेज हो जाती है और बीमारी से उबरने की मात्रा में सुधार लाती है I तथापि आध्यात्मिक चिकित्सा पारंपरिक औषधि का परिपूरण कर सकती है I इसलिए जब स्वामीजी चिकित्सा करते हैं तो वे अच्छी ऊर्जा को समाहित करते हैं और बुरी ऊर्जा को त्यागने में मदद करते हैं I बुरी ऊर्जा के अनेक कारण हैं: यह अंशत: हमारे अपने सोचने एवं जीवन की शैली के द्वारा उत्पन्न होती है जो हमारे विरुद्ध काम करती है I लेकिन जिसे हम प्राय: समझ नहीं पाते हैं, क्योंकि हम अपनी शैली को अत्यधिक प्रबलतापूर्वक अंगीकार करते हैं I तथापि हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ प्रकट होने वाली बुरी ऊर्जाओं से भी हम प्रभावित होते हैं I उदाहरण के लिए जब लोग मनोविकारों जैसे कि ईर्ष्या एवं शत्रुता, प्रेम के अभाव या अत्यधिक शोर के बीच रहना या अन्य बुरे जीवन स्थितियों का सामना करते हैं तो बुरी ऊर्जा की उत्पत्ति के अनेक कारण होते हैं जो भौतिक, भावनात्मक, राजनीतिक या वे हमारे स्वयं की अज्ञानता एवं लापरवाही के कारण हो सकते है I

स्वामीजी "स्पर्श चिकित्सा" का प्रयोग करते हैंI उनकी उंगुलियाँ हल्के से शरीर पर घूमती हैं और उनकी उंगलियों के कम्पन से वे चिकित्सा ऊर्जा को रोगी के शरीर में भेजते हैं I

प्रत्येक चिकित्सक अनुपम हैं क्योंकि उन सभी के पास दिव्य ऊर्जा को भेजने की अपनी व्यक्तिगत विधियाँ हैं I स्वामीजी की विशेष पद्धति का मानव की प्रकृति से बहुत लेना-देना है: जैसा हम सब जानते हैं कि सभी मनुष्यों को व्यक्तिगत संबंध एवं स्नेहपूर्ण स्पर्श की आवश्यकता होती है क्योंकि यह हमें जीवित रखता है और यह हमारी प्रकृति है I इसके अतिरिक्त हमें एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण से यथार्थ को समझने की आवश्यकता है ताकि हम अपने आप को एवं जिस दुनिया में हम रहते हैं उसे समझ सकें I इसी प्रकार, हम ईश्वर के साथ भी एक व्यक्तिगत संबंध चाहते हैं चूँकि हम मनुष्यों के बीच व्याक्तिगत्य संबंध ढूँढते हैंअव्यक्तिक संबंध की अपेक्षा ईश्वर के साथ एक व्यक्तिगत संबंध बनाना हमारे लिए अधिक आसान है, चूँकि हम अपने साथी मनुष्यों के साथ ऐसा संबंध बनाना भी नहिं चाहते हैं I तत्पश्चात ऐसे सभी संबंध किसी भी प्रकार से लंबे समय तक टिकते नहीं हैं I इसलिये स्पर्श चिकित्सा चिकित्सा का बिल्कुल व्यक्तिगत रूप है अर्थात्‌ मनुष्य, जो सभी बिल्कुल निजी एवं व्यक्तिगत अस्तित्व हैं,  की प्रकृति से घनिष्ठतापूर्वक जुड़ा हुआ है I

जब स्वामीजी हल्के से रोगी का स्पर्श करते हैं तो व्यक्ति को अनुकूल ऊर्जा का व्यक्तिगत आभास होता है जब हम चेतनापूर्वक ऊर्जा के गुण का अनुभव करते हैं तो यह हमारे शरीर में अधिक प्रभावपूर्ण ढ़ंग से कार्य करता है एक उदार एवं मृदु स्पर्श हमारी आत्मा तक पहुँचने का एक मार्ग भी है कुछ लोगों ने कहा कि स्वामीजी का स्पर्श स्फुर्तिदायक  जल के समान है I चिकित्सा के बाद एक महिला ने कहा कि उन्होंने महसूस किया कि जैसे उन्होंने पवित्र गंगा नदी में स्नान किया हो I जिस ढ़ंग से एक व्यक्ति महसूस करता है वह व्यक्तिगत रूप से भिन्न हो सकता है, लेकिन मुख्य  विषय यह है कि चिकित्सा हमारे शरीर को हमारे मन एवं आत्मा के साथ समन्वित एवं एकीकृत करता है और एक पूर्ण दिव्य ऊर्जा से अंदर एवं बाहर चिकित्सा करने में हमारी मदद करता है I

स्वामीजी के चिकित्सा के कार्यों की प्रशंसा कर हम हमारे अपने अनुकूल आतरिक गुणों की खोज तथा प्रशंसा करना सीख सकते हैं और उनसे अपना कार्य करवा सकते हैं हमारे अपने अनुकूल गुणों की समझ एक शक्ति को प्रकट करती है जो बहुत चिकित्सात्मक है I चूँकि प्रशंसा का कार्य अपने आप में सम्भावित रूप से बहुत चिकित्सामक है I इस प्रकार से हम अपने स्वास्थ्य में सुधार ला सकते हैं तथा उन लोगों पर अनुकूल प्रभाव डाल सकते हैं जिनके साथ हम अपने हृदय तथा घर का भागीदार बनते हैं  I हमारी अनुकूल प्रकृति तब उस दुनिया में भी फैल सकती है जहाँ हम रहते हैं

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स्वामीजी  यशेन्दु गोस्वामी  हमारा उद्देश्य  आश्रम  पवित्र गुफा  दूरस्थ चिकित्सा  आध्यात्मिक चिकित्सा  चिकित्सा सूचना  गृह/ व्यवसाय /कार्यस्थल के लिए चिकित्सा शान्ति (मौन) चिकित्सा  बच्चे का प्रायोजक 

मंत्र के लिये प्रार्थन  प्रेम ध्यान  पूजन समारोह  संस्थापक  निदेशक  दर्शन  भोजन का योगदान  जन्मदिवस समारोह  आयुर्वेदिक योग  वैदिक ज्योतिषशास्त्र  आयुर्वेदिक पाक कार्यशाल

पंचकर्म  आयुर्वेद  हमारे निकट  चक्र कार्यशाला  चक्र नृत्य पार्टी  चक्रों में संतुलन  अपने समूह को लाएँ  तन्त्र  योग  आयुर्वेदिक मालिश  स्वामीजी की डायरी  आयोजक  शाकाहार

 

 

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