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ध्वनि का प्रभाव

हमारी चेतना को अनुकूल
बनाने के लिये ध्वनि में एक अद्भुत शक्ति
हैI
वास्तव
में,
अधिकांश
अनुकूलन ध्वनि के माध्यम से,
विशेष
रूप से शब्दों के रूप
में
होती हैI
शब्दों
या संगीत के जैसा किसी
दूसरे संवेदी संभाव्यता में हमें
प्रभावित करने कि इतनी क्षमता नहीं हैI
ध्वनि
हृदय एवं मन को प्रेरित कर हमें
अवचेतन
तथा चेतन रूप में प्रभावित करता हैI
विभिन्न ध्वनि
निर्माण मन के
विभिन्न कार्यों को पूरा करता
हैI
प्रभावों एवं सूचनाओं का ध्वनि कंपन बाह्य मन (मानस) को तैयार करता हैI
मूर्त
ज्ञान,
सिद्धांतों एवं आदर्शों का ध्वनि कंपन बुद्धि को बनाये
रखता हैI
हमारी
गूढ़्तम
भावनाएँ एवं अंतर्बोध का ध्वनि
कंपन आंतरिक मन या चेतना (चित्त) को तैयार
करता हैI
ध्वनि
का अंतिम स्रोत आध्यात्मिक हृदय या चेतना का केन्द्र,
हमारा
सच्चा
आत्म
(आत्मन) जिससे शाश्वत ध्वनि
या दैवी शब्द हमेशा
उत्पन्न होता हैI
मन
को पुनर्योजित करने के लिये,
इसके
नकारात्मक अनुकूलन को दूर
करने के
लिये एवं लाभप्रद वस्तु से बदलने के लिये,
जो
मनोवैज्ञानिक उपचार का सार
है; ध्वनि
का उपचारात्मक प्रयोग प्रमुख
उपकरण हैI
मन्त्र
की उपचारात्मक शक्ति
उपचार
में ध्वनि का प्रयोग करने के अनेक तरीके हैं,
सलाह
अपने
आप में
संगीत के प्रति अत्यधिक शाब्दिक
हैI
आयुर्वेदिक उपचार में सर्वाधिक
महत्वपूर्ण ध्वनि चिकित्सा मन्त्र हैI
मन्त्र
का अर्थ "मननत त्रयति इति मन्त्र:"
"वह जो
रक्षा करता है"I
मन्त्र
विशेष ऊर्जायुक्त ध्वनियाँ हैंI
वे ॐ
के जैसी एकल सामान्य
ध्वनियाँ या विशेष छन्द या लय में पढ़ी जाने वाली या विभिन्न तरीकों से गायी
जानेवाली प्रार्थनाएँ हैंI
मन्त्रों को शक्तियुक्त करने
एवं
उन्हें मनोवैज्ञानिक
रूपांतरण के उपकरण के रूप में परिवर्तित करने के लिये एक नियमित तरीके से
दोहराया
जाता हैI
कोई
संकेत शब्द या छंद जिसे हम दोहराते हैं,
जिसका
स्मरण करते हैं एवं
जिसे
अपनी गहराई में रखते हैं वह एक प्रकार का मन्त्र हैI
मन के
सही उपचार के लिये
सात्विक
मन्त्र की आवश्यकता होती है जिसका उद्देश्य अहं को तोड़ना एवं आत्म चेतना को
बढ़ावा
देना हैI
मन्त्र
आत्म सम्मोहन का एक रूप नहीं है बल्कि अचेतन ध्वनि एवं चिंतन
स्वरूप
को विभाजित कर उनके द्वारा मन को पुन: अनुकूलित करने का एक तरीका है जो
अधिक उच्चतर
सच्चाई एवं ऊर्जा को
प्रतिबिंबित करती हैI
मन्त्र
एवं चेतना
मन
का नियन्त्रण एवं मन की प्रच्छन्न शक्तियों को प्रकट करना
(सिद्धि)
मन्त्र की शक्ति से उत्पन्न होता हैI
मन्त्र
चेतना (चित्त) का उपचार करने
की
मुख्य विधि है एवं मन के सभी स्तरों का उपचार करने में सहायक हैI
मन्त्र
हमें
कंपायमान चेतना को परिवर्तित करने की अनुमति प्रदान करता हैI
यह मन
के साथ सम्बन्ध
रखने की
एक प्रत्यक्ष विधि हैI
मन्त्र
मन की ओजस्वी संरचना को बदल देती है जो
समस्या
को समाप्त कर देती है एवं मानसिक क्षेत्र की ऊर्जा को बदल देती है जबकि
समस्या
के विषय में सोचना उसे सुदृढ़ कर सकती हैI
हमारी
चेतना गहरी आदतों एवं
प्रवृत्तियों से बनी हैं और पुरानी,
कष्टदायक एवं अप्रिय स्मरणों से दागदार होती
हैI
हमारे
स्मरण सूक्ष्म द्वनि कंपन हैं जिसे हम अपनी चेतना में बनाये रखते हैंI
वास्तव
में मन्त्र क्या है?
मन्त्र की
पुनरावृत्ति का साधारण अर्थ है ध्वन्यात्मक अभिप्राय
वाले एक
वाक्य या शब्द-समूह की पुनरावृत्तिI
बस इतना
हीI
मन्त्र
मूलभूत रूप से ध्वनि से संबंधित हैI
मन्त्र
ध्वनि है एवं
ध्वनि
इस जगत में प्रत्येक चीज में गूँजती
हैI
जब जल
प्रवाहित होता है,
इससे
निकलने
वाली
कलकल की आवाज मन्त्र हैI
जब हवा
पेड़ों से होकर बहती
है,
इससे
निकलने
वाली सरसराहट
की आवाज मन्त्र हैI
जब हम भूमि
पर चलते हैं,
हमारे
पदचापों से ध्वनि
उत्पन्न
होती है,
एवं वह भी
मन्त्र हैI
मनुष्य
के अंदर एक स्वजन्मा,
अटूट
ध्वनि है
जो अपने
आप को हमारे साँसों के साथ सदा दोहराती है एवं यह ध्वनि भी एक मन्त्र
हैI
धवनि
में असीम शक्ति है,
वास्तव
में इसमें समूचे जगत की सृष्टि
करने की
शक्ति हैI
येह
लिखा गया है कि ईश्वर पहले धवनि
के रूप में प्रकट
हुयेI
(शुरू
में शब्द था,
एवं
शब्द ईश्वर के पास थाI
न्यू
टेस्टामेंट,
जॉन
1;1-2)
प्राचीन
भारतीय विश्वासों के अनुसार,
आरंभ
में ध्वनि थी जो ॐ के
रूप में
गूँजती रही एवं उस ध्वनि से सब चीज अस्तित्व में आईI
आधुनिक
वैज्ञानिक भी हमारे प्राचीन ज्ञानियों के समान यह मानने लगे
हैं एक
कंपन है जो समूचे ब्रह्मांड
में अनवरत गूँजता रहता हैI
जब
अक्षर एवं शब्दांश
मिल जाते हैं,
वे शब्द
का निर्माण करते हैंI
हमारे
आध्यात्मिक एवं सांसारिक जीवन दोनों केवल
शब्दों के कारण ही
संभव हैंI
; भाषा
के बिना,
हम अपना
कोई भी क्रियाकलाप पूरा नहीं कर सकते हैंI हमारे
द्वारा
प्रयुक्त प्रत्येक शब्द
की अपनी शक्ति है एवं यह अपनी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती हैI
मन्त्र
अक्षरों एवं शब्दांशों
का कोई साधारण
मेल नहीं है,
बल्कि
एक क्रियाशील शक्ति
हैI
ईश्वर
का नाम ईश्वर से भिन्न नहीं हैI
मन्त्र
को ईश्वर का ध्वनि-आवरण कहा जाता
है:
ध्वनि के रूप में यह ईश्वर हैI
भागवद्
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं,
"
धार्मिक
कृत्यों में,
मैं
मन्त्र आवृत्ति का संस्कार
हूँ"I
इसके
द्वारा उनका मतलब है कि जबकि अन्य तकनीक उन्हें प्राप्त करने
के साधन
हैं मन्त्र उनका वही अस्तित्व हैI
इसलिये
मन्त्र को दोहरा कर ईश्वर का
अनुभव
करना इतना आसान हैI
मन्त्र
चिंतन एक शब्द-समूह की आवृत्ति है जो ध्वनि कंपन
उतपन
करती है जो हमारे हृदय एवं मन में ईश्वर के प्रति प्रेम जाग्रत करती हैI
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विभिन्न
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मन्त्र
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निर्लाभ धर्मार्थ संगठन हैं जिनका उद्देश्य भारत में गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान
करना हैI
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