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प्राक्कथन
मई
2001
में स्वामीजी के साथ भेंट मेरे लिये एक बहुत बड़े
सम्मान की
बात थी
I
हमारे परिवारों के बीच जो मित्रता कायम है वह प्रेम का
है और हम सब के
लिये अमुल्य है
I
इस विषय
पर मैं यह समझाना चाहता हूँ कि
27
मई
2001
को मैलोर्का के
लिये एक उड़ान के दौरान जब मैं स्वामीजी से मिला तो परिस्थितियाँ ऐसी
अनोखी थी
कि
मैंने परवर्ती तारीख को हमारे
प्रगतियों
एवं अनुभवों के संबंध में एक पुस्तक
समर्पित करने का निश्चय किया है
I
यह
मेरे प्रथम संपर्क की कहानी या समय-रेखा
है:
कहानी की
सच्ची पृष्टभूमि को समझने के लिये किसी को यह विचार
करना
चाहिये कि हमारी प्रथम भेंट 24
दिसंबर,
2000
को हुई;
केवल मुझे यह पता नहीं था
कि यह भेंट
हुई थी
I 24
दिसंबर,
2000
को मेरे एक बहुत अच्छे मित्र बरनड डाइट्रिक्स,
जिनके
साथ मैंने वर्षों पहले काम किया था,
द्वारा भेजा
गया एक अप्रत्याशित
क्रिसमस कार्ड
मिला I
कार्ड में दो
देवताओं को बाँह में बाँह डाले
दिखाया गया जिसे मैंने
नहीं पहचाना I
उस समय मैं भारत में बहुत विस्तृत रूप से भ्रमण कर
चुका था लेकिन
अबतक भारतीय धर्म का कोई गहरा ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ
था
I
मैंने कार्ड को रख लिया एवं इसपर सरसरी नजर डलने लगा
I
---समय
बीतता गया-----
मई
2001
को मेरी पत्नि ऐन्ड्रिया मित्रों के साथ मैलोर्का
भ्रमण करने
गयी थी
I
योजना यह थी कि मैं सप्ताह के अपने काम को समाप्त करूँ
एवं अपने पुत्र
रैवेल के साथ उनका अनुसरण करूँ I
मैं सैर की प्रतीक्षा करने लगा और सुखद आशा से
परिपूर्ण था I मैं
निश्चिंत था
एवं नये अनुभवों के लिये बहुत उदार था I
तदनुसार मैंने सैर के लिये
सफेद जीन्स और एक चमकीले नारंगी रंग की कमीज पहनी I
जीवन बहुत अच्छा था I
हैम्बर्ग हवाई अड्डे के टर्मिनल
4
पर आगमन की सूचना दर्ज कराने के
बाद रैवेल एवं मैं हमारे हाथ में समय रहने के कारण
नीचे बैठ गया तथा हवाई अड्डे
पर होनेवाली गतिविधियों का अवलोकन करने लगा I
यत्रियों की भीड़
में मैंने एक युवक को भव्य
सफेद पोशाक में देखा
जिसके लंबे काले बाल थे
एवं दाढ़ियाँ थीं I
उस व्यक्ति के चलने का ढ़ंग अलग था और वह
भीड़ के बीच से हल्के
से ठाठ से जा रहा था I
उसकी निश्चलता ने मुझे वश में किया और
मुझे ध्यान का स्मरण कराया
I
मैंने रैवेल को बताया: " देखो,
एक सच्चा राजा जा रहा
है"I
हम उस आकर्षक राजा की आँखों से ओझल हो गये एवं हमें
कुछ खरीददारी
करने का मौका मिला
मैंने अपनी पत्नि के लिये सुगन्धि एवं अपने लिये एक
नया इत्र खरीदा I
मेरी मनोदशा इतनी अच्छी थी कि मैंने शैम्पेन की दो
बोतलें भी झपट लीं
I
सवार होने के बुलावा की प्रतीक्षा करने के समय हम बैठ
गये एवं
विमानपट्टी पर वायुयान के जमीन
पर उतरने
तथा उड़ान भरने
की क्रिया देखते रहे
I
अपने
अंदर मैंने एक आंतरिक शांति महसूस किया,
मैंने चारों तरफ
निगाहें डाली और
मेरी
निगाह आकर्षण से परिपूर्ण उस कुलीन जन पर पड़ी
I
मैं गहरे रूप से मंत्रमुग्ध हुआ
I
मैं खुश था कि वे भी
मैलोर्का भ्रमण
करनेवाले मालूम पड़ते थे
I
वे
भारतीय थे यह स्पष्ट था
I
रैवेल की उम्र उस समय पाँच वर्ष थी और
इसलिये मैंने यह निष्कर्ष
निकाला कि उड़ान भरते
ही वह शीघ्र
सो जायेगा I
इससे मुझे उड़ान
के दौरान दो घंटे
का
आधा से अधिक बेहतर समय
भारत के उस दिलचस्प व्यक्ति के साथ संपर्क बनाने के
लिये
मिलेगा
I
उड़ान केवल आधा पूर्ण होने का मतलब था कि मैं रैवेल के
साथ
गलियारेवाली जगह का सहभागी था
I
उस अपरिचित व्यक्ति ने वायुयान के पिछले अर्द्ध भाग
में सामने की तरफ कुछ
कतार आगे अपना
स्थान ग्रहण किया I
मैंने अपने आपको धैर्य
रखने के लिये कहा और
मैं उस अवसर
की प्रतीक्षा
करने लगा जब वह या
मैं बाद
में जायेंगे I
जैसी शंका थी,
रैवेल मिनटों में ही गहरी निद्रा में सो गया
I
उस व्यक्ति के द्वारा प्रथम चाल चलने के लिये
प्रतीक्षा करने का मेरा
दूसरा अनुमान तब निश्चित हुआ जब वह शौच-घर
जाने के लिये खड़ा
हुआ
I
मेरा अवसर उसके
लौटने पर होता
I
जब वह कुछ मिनटों के बाद मेरी जगह के पास पहूँचा तो मैंने
उसका इन
शब्दों के साथ अभिवादन किया: "हैलो स्वामी!"
सहज-ज्ञान से मैंने सोचा कि मेरा सन्निकर्ष अधिक सीधे
स्वर में था,
तथापि,
वे सज्जन रूक गये,
मुड़े एवं मुझे देखकर मुस्कराने लगे I
मेरा प्रश्न था: "आपको कहाँ जाना है?"
उन्होंने उत्तर दिया: " मैं मैलोर्का की यात्रा कर रहा
हूँ"
I
इस पर मैंने तुरंत अपने आपसे कहा:"कितना बेवकूफी भरा
प्रश्न है,
क्योंकि हम एक ही विमान में हैं जो कि पहले से ही
पाल्मा जाने के रास्ते में
है!"
मैंने पूछा: "आप मैलोर्का में क्या करते हैं?"
उन्होंने कहा: " मैं धर्मोपदेश दे रहा हूँ एवं ध्यान
कर रहा हूँ"
I
कुछ कारणों से सत्तर के दशक के हिट धुन एवं चलचित्र:
"प्रीचर मैन
(धर्मोपदेशक
व्यक्ति) दिमाग में आ गये I
"आश्चर्यजनक"!
मैंने उत्तर दिया एवं अपनी कतार में उसे रास्ता दिया
I "मैं
भी ध्यान करता हूँ"
और मैं कभी उसके साथ ध्यान
करने का स्वप्न देखने
लगा I
मेरा अगला प्रश्न था,
"आप
द्वीप पर कहाँ रूके हुये हैं?
उन्होंने जवाब दिया,
"मैं
नहीं जानता",
मेरे पास केवल एक फोन नंबर है
I
"वाह",
यह आश्चर्य की
एक सहज प्रतिक्रिया थी
कि मैं
यात्रा के एक
सच्चे उमंगी व्यक्ति से मिला जिसे पता नहीं था
कि उसके साथ क्या होने जा रहा था
उसने मुझे बताया कि वह वृंदावन,
जो कि आगरा से अधिक दूर नहीं है, का
रहनेवाला था
I
मैंने वृंदावन के बारे में पहले कभी नहीं सुना था
एवं मैं इस बात से
बहुत दु:खी हुआ कि मैं भारत
अनेक बार गया था और
मुझे इस पावन भूमि
का न तो कोई
अनुभव हुआ और
न ही इसके बारे में कभी सुना
I
यह जानकर कि यह आगरा एवं ताजमहल के
निकट है मुझे थोड़ी सी शांति मिली एवं इससे मुझे
दिग्विन्यास का
एक सामान्य विचार
हुआ
I
अंत में मैंने उनका नाम पूछा I
उनका उत्तर था
"गोस्वामी बालेन्दु" I
उन्होंने इतनी मृदुलता से कहा मानो यह एक सुन्दर मधुर
गीत हो I
वास्तव में मैंने गलती से उन्हें कहते सुना "स्वामी"
और यह सोचा कि
कोई ओसो सन्यासीन मेरे बगल में बैठा है
I
स्वयं सन्यासीन होने के कारण मैं और अधिक उत्तेजित हो
गया
I
वास्तव में मैंने गलत सुना था और यथायोग्य उनसे पूछा कि
उनके नाम
का अर्थ
क्या है:
उन्होंने उत्तर दिया,
"बालेन्दु का
अर्थ है: छोटा चाँद" I
मुझे प्यार हो गया था......जैसे दिल पर तीर चुभ गया
हो!
छोटा चाँद,
छोटा चाँद,
मैंने बार-बार अपने आप दुहराया
I
मुझे प्यार
हो गया था !
क्योंकि रैवेल जाग गया था यह स्पष्ट था कि हम पाल्मा के
निकट
पहुँचनेवाले थे I
बालेन्दु ने मुझे अपना फोन नंबर दिया और मैंने फोन
करने का वादा
किया
I
मैंने अपने आपसे कहा,
"सफर
की कितनी शानदार शुरूआत हुई!"
तीस मिनटों के बाद सामानों एवं रैवेल को हाथ में पकड़कर
हम
सुरक्षाकक्ष से गुजरे एवं हमने ऐन्ड्रिया को हमारी
उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते
रहने की आशा की
I
कार पार्क जाने के रास्ते में मैं ऐन्ड्रिया को बालेन्दु के
बारे में
बताना चाहता था जब उसने यह सूचित किया कि उसने एक
दिलचस्प भारतीय व्यक्ति को
टर्मिनल छोड़ते देखा था और
उसने यह अनुमान किया
कि मैं उसके संपर्क में था I
वह तुम्हारा नारी सुलभ अंतर्बोध!!
सोमवार को पूरे सुबह मैं यह आश्चर्य कर रहा था कि
गोस्वामी संभवत:
कहाँ ठहर सकते थे?
यह स्पष्ट था
कि उनके पास कोई सुराग नहीं था
कि वे कहाँ टिके
हुए थे
एवं उनके पास उनके (स्वामीजी) द्वारा
दिया गया केवल फोन
नंबर था I
यद्यपि यह
विचित्र था
तथापि उनके
लिये यह यथेष्ट
मालूम पड़ता था I
मेरी मनोदशा बहुत अच्छी थी और मैं उनको उस अपराह्न फोन
करने की
प्रतीक्षा करने लगा I
हमेशा की तरह हमने
प्लाजा डि पाल्मा के निकट एक फ्लैट थोड़े
समय के
लिये भाड़े
पर लिया था I
वहाँ से शहर पहुँचना आसान
था
I
उस अपराह्न मैंने बालेन्दु को फोन किया एवं फोन पर एक
दूसरा अपरिचित
भारतीय आवाज सुनाई दी
I
मैंने बालेन्दु के बारे में पूछा I
"कृपया
एक मिनट ठहरें"I
"हाँ,
हलो"?
एक मधुर आवाज सुनाई दी I
मैंने पूछा,
"बालेन्दु,
आप कहाँ हैं"?
उन्होंने किसी से हिन्दी में पूछा एवं उत्तर दिया
"शिनकेंस्ट्रेब"I
उस अनोखे पते को सुनकर मुझे हँसी आ गयी
I
एक धार्मिक गुरू बदनाम
बैलरमैन के बीच
I
हास्यास्पद!!
"आप
कहाँ हैं"?
मैंने अविश्वास से पूछा
I
"शिनकेंस्ट्रेब"!
उन्होंने मुस्कराते हुये कहा "आप
6
बजे दर्शन के लिये आ सकते हैं"
I
मैंने पुष्टि किया और
ज्योंही मैंने फोन
नीचे रखा मेरा
पूरा शरीर पूर्वानुमान
से रोमांचित हो उठा I
मेरी प्रथम भेंट अकेले होगी एवं मैं इसके अनुभव को
ऐन्ड्रिया को
बताऊँगा
I
मैलोर्का के आकार को ध्यान
में रखते हुये हमअलोगों का बैलरमैन
से केवल
10
मिनट की डूरी पर होना एक बहुत बड़ा संयोग था I
सचमुच अविश्वसनीय
I
छ: बजे के ठीक पहले मैं "शिनकेंस्ट्रेब" के लिये विदा
हुआ और कमोवेश
सड़क पर नाच रहा था,
प्रत्याशा से भरा हुआ,
छोटी सड़कों एवं विशाल फिंका उद्यान
से होता
हुआ गुजर
रहा था
I
परछाईयों के रहस्य एवं
संध्या के प्रकाश ने मिलकर मेरे
अंदर एक महानता
की भावना
उत्पन्न की;
मैं जीवित था!
शिनकेंस्ट्रेब के अंत में एक चारमंजिला इमारत में
प्रवेश करने के
पूर्व मैं रूक गया एवं अपने आप को तैयार करने के लिये
कुछ समय लिया I
क्षेत्र एवं
सड़क के स्वरूप का अवलोकन
करते समय इसने मुझे अचानक पूर्णतया दंग,
शांत भी
कर दिया I
मैं सड़क पर नीचे समुद्र की तरफ देख रहा था
I
सड़क के दूसरी ओर कुछ मोटरगाड़ियों
ने पत्थर
के एक तोरणपथ से होकर प्रवेश किया
I
मैंने घंटी बजायी I
प्रवेश द्वार खुला था,
साथ ही चौंथी मंजिल पर फ्लैट का दरवाजा भी
I
दो जोड़ी भारतीय आँखों ने मेरा अभिवादन किया
I
"मेरा
नाम डॉ. कोसैक है",
मैं यहाँ स्वामी बालेन्दु से मिलने के लिये
आया हूँ
I
दो महिलाएँ मुझे रहने के स्थान पर ले गयीं जो अंगीठी
के पास रखी एक
छोटी मेज एवं एक सोफे के सिवाय
पूर्णतया खाली था
I
दृश्य भव्य था एवं साफ-साफ
दिखाई देता था I
"मैं
इसे जानता था;
आप यहाँ से भूमध्यसागर देख सकते हैं!" मैंने
स्वत: कहा
I
एक महिला ने मुझे धैर्य रखने एवं नीचे बैठने के लिये
कहा
I
यह भी
पूछा कि क्या मुझे
पीने के लिये कुछ या फल चाहिये?
मैंने कुछ मूँगफली लिये एवं फर्श
पर पलथी मारकर बैठ गया
I
यथासमय दरवाजे की घंटी बजी एवं सड़ी में और दो भारतीय
महिलाओं ने कमरे
में प्रवेश किया
I
वे मेरे बगल में नीचे बैठ गयीं
I
अगले बीस मिनटों में और अधिक भारतीय महिलायें आयीं जब
तक हम लगभग
पन्द्रह लोग एक
अर्द्ध वृत्ताकार परिधि में बैठे थे I एक
मात्र पुरूष
के रूप में
वहाँ मेरी
उपस्थिति
की हकीकत ने मुझे क्षण का असाधारण
रूप से मजा दिलवाया I
यथासमय बालेन्दु ने कमरे में प्रवेश किया
I
वे मुस्करा रहे थे,
संकेन्द्रित एवं शांत थे
I
हमारी नजरें मिलने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई
I
वे
सोफा पर बैठ गये एवं वे शांतिपूर्वक धीरे-धीरे
बोल रहे थे I
मैंने सभी उपस्थित
व्यक्तियों के लिये एक प्रार्थना का अनुमान लगाया
I
कोई बातचीत नहीं कर रहा था एवं
एक ऊर्जायुक्त चुप्पी कायम थी
I
बालेन्दु ने हिन्दी में गीत शुरू किया
I
क्षेत्र से फ्लैट में
आनेवाली आवाज का कोई प्रभाव नहीं पड़ा एवं उनकी आवाज
धीरे-धीरे शांत होती गयी
I
अवश्य ही वे जो कुछ भी बोल रहे थे मैं एक भी शब्द नहीं
समझ रहा था
I
मैंने उनकी आँखों में जो ऊर्जा,
तीव्रता एवं आकृति
देखी मैं
उससे बहुत अवगत था I
जब
मैं पूना में था तो उस समय ओसो की उपस्थिति में मुझे
ऐसा कुछ अनुभव हुआ था |