jaisiyaram
jaisiyaram
Select Language
Bookmark and Share

तन्त्र

Recommend this page|HOME
Swami Ji

तन्त्र नाम दो शब्दों "तन" एवं "त्र" से मिलकर बना है I तन ’तनोति’ शब्द का संक्षिप्त रूप है और जब संस्कृत से इसका अनुवाद किया जाता है तो इसका अर्थ विस्तार करना होता है I त्र ’त्रयति’ शब्द का संक्षिप्त रूप है और जब संस्कृत से इसका अनुवाद किया जाता है तो इसका अर्थ मुक्ति होता है I इसलिये तन्त्र शब्द इन दो शब्दों का मेल है एवं इसका अर्थ मुक्त होने के लिये अपनी चेतना का विस्तार करना है I

तन्त्र के विषय में स्वामीजी का विचार है कि उन्हें आश्चर्य होता है कि पाश्चात्य जगत  तन्त्र को क्यों सिर्फ यौन क्रिया से जोड़ती है; यह तन्त्र के विषय में एक गलत विचार एवं धारणा है I पाश्चात्य जगत में यह भी व्यापक रूप से जाना जाता है कि लोग तन्त्र को विभिन्न रंगों जैसे कि सफेद, लाल तथा काले से जोड़ते हैं I  

संस्कृत तांत्रिक धर्मग्रंथों में तन्त्रों में यौन ऊर्जा संबंधी बहुत संदर्भ मिलते हैं I यह इस कारण से है कि यौन ऊर्जा हमारी चेतना का एक बड़ा भाग है एवं यह किसी विकृत अश्लील यौन मानसिकता से संबंध नहीं रखता है I तांत्रिक धर्मग्रंथों में यौन ऊर्जा अत्यंत धार्मिक है एवं यह योगियों न कि भोगियों के लिये है I तन्त्र मुक्त होने के लिये प्रेम की ऊर्जा उतपन्न करने के लिये है I

स्वामीजी उन लोगों के प्रति बहुत खेद प्रकट करते हैं जो तन्त्र के नाम पर यौन क्रिया की बिक्री करते हैं I  तन्त्र चेतना प्राप्त करने के लिये चक्रों एवं कुण्डलिनि के साथ कार्य करने के विषय में है और इसकी ही शिक्षा स्वामीजी अपनी कार्यशालाओं में देते हैं न कि तांत्रिक यौन क्रिया के विषय में I

तन्त्र आत्मा के साथ प्रेम करने के विषय में है I जिस प्रकार तकनीक इस आधुनिक दिनों के जीवन निर्वाह में हमें अपने जीवन स्तर को ऊँचा करने एवं प्रगति दिलाने में मदद करता है उसी प्रकार तन्त्र के साथ हम "यन्त्र एवं मन्त्र" का प्रयोग करते हैं जो वैसी विधियाँ हैं जिनका प्रयोग हम तकनीक की तरह अपनी चेतना को अधिक तीव्रतर गति से मुक्त करने के लिये करते हैं I
निर्लिप्तता तन्त्र में हमें स्वयं को मुक्त करने की कुंजी है I निर्लिप्तता का अर्थ आपका किसी से बिना किसी कारण के प्रेम करना है क्योंकि जब आप किसी से किसी कारण के लिये प्रेम करते हैं तो आप आसक्ति के साथ प्रेम करते हैं I आपका किसी के साथ बिना किसी कारण के प्रेम करने योग्य होने के लिये आपके हृदय में करूणा, संवेदना एवं मनोभावना होना आवश्यक है  I