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आप कौन हैं स्वामीजी और
मैं कौन हूँ?
सच में मेरे पास इसका
कोई
उत्तर नहीं है
I
मेरे लिए आप न तो
कोई
गुरू हैं और ना ही मालिक
I
आपमें एक प्राकृतिक एवं स्वत: स्फूर्त
बालसुलभ
प्रेम
प्रतिबिम्बित होता है
I
आपके साथ हुए समागम में
-
यह
पारस्परिक प्रतिबिम्ब
-
मैंने पुन:
अपने
हृदय में प्रेम
को प्राप्त कर लिया है
I
और
प्रेम की वहीं
से शुरूआत होती
है जहाँ चिन्तन समाप्त होता है
I
प्रेम व्यक्तिगत मत से मुक्त होता
है,
शक्ति के दावे से मुक्त होता है,
निर्भरता से मुक्त होता है
I
यही
वह
प्रेम
है जो आपके परिवार में,
बच्चों के प्रति
उनके प्रेम में और
उनके
समस्त
धर्मार्थ कार्यों में
प्रज्वलित
होता है
I
प्रेम समस्त आध्यात्मिक पथों के विरुद्ध
यथार्थ रूप से सहनशील है
I
यह प्रेम मुझे पुन: सादगी एवं लौकिक कर्तव्य की ओर
वापस
ले आया
है
I
यह एक ऊर्जा है जो सभी अवधारणाओं
से श्रेष्ठ
है और इस समय अपने आपको प्रकट
कर रही है
I
इस तरह से हम मित्र बन गए जो कि सभी कुछ आपस में
बाँटते हैं
I
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